परनिंदा

परनिंदा की कुप्रवृत्ति से शायद ही कोई अछूता हो। जिस प्रकार परहित के समान कोई धर्म नहीं, परपीड़ा समान कोई निकृष्टता नहीं, उसी प्रकार परनिंदा भी सर्वथा त्याज्य है। रामचरितमानस में भगवान श्रीराम शबरी को नवधा भक्ति की समझ देते हुए कहते हैं, जो मिले वही पर्याप्त है, उसी में संतोष होना चाहिए और स्वप्न में भी दूसरों के दोषों को नहीं देखना चाहिए। यह वर्जना इस बात को स्पष्ट करती है कि जाग्रत अवस्था में परनिंदा से बचना आवश्यक है। अच्छे लोग हमें खुशी देते हैं, श्रेष्ठ लोग स्मरणीय यादें देते हैं, जबकि परनिंदक नकारात्मक बातें सिखाते हैं। किसी संत ने कहा है, " परनिंदा से किसी को कुछ हाथ नहीं लगता। ऐसे लोग महा मूर्ख होते हैं और पाप का पर्वत ढोने का काम करते हैं। '

परनिंदा को एक प्रकार का रस कहा गया है, जिससे परनिंदा प्रेमी विरत नहीं रह पाते, लेकिन यह एक नकारात्मक प्रवृत्ति है, जिसमें लोग कुंठा, प्रतिशोध या ईर्ष्या के कारण संलग्न होते हैं और अपनी कमियों को छिपाते एवं स्वयं को श्रेष्ठ दिखाते हैं। इससे न केवल दूसरों की भावनाओं का निरादर होता है, बल्कि यह आपसी संबंधों को भी क्षति पहुंचा सकता है। ऋग्वेद के अनुसार, यह स्वयं के अहित का कारण भी बन सकता है, क्योंकि निंदारस में रति पापकर्म के भागी बनने के साथ अपने मूल कार्य को विस्मृत कर देते हैं।

जैसे क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, निंदारसभोगी को यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके ईर्ष्यालु भाव की तरह कोई अन्य भी उसके प्रति ऐसे अनुदार विचार रख सकता है। इसे रस नहीं, घातक रोग समझकर इससे दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए सदैव प्रसन्न रहकर, छोटी-छोटी बातों के लिए कृतज्ञता व्यक्त कर, दूसरों के सहयोगी बनकर, स्वस्थ, सक्रिय रहकर, सकारात्मक, धैर्यवान, क्षमाशील रहना आवश्यक है। अपनी कमियों को स्वीकार कर सुधार करना चाहिए।

एसएन दुबे 'स्नेही'

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