सकारात्मकता की वर्षा
वर्षा ऋतु को अत्यंत सुंदर एवं लुभावनी ऋतु माना गया है। ग्रीष्म की तपन के बाद वर्षा से स्नान कर पृथ्वी पुनः अपने उत्कर्ष की अवस्था को प्राप्त करती है। चहुंओर हरियाली पसर जाती है। बहते पानी की कलकल ध्वनि मन को सुकून प्रदान करती है। मोर नाचने लगते हैं। पपीहा मधुर ध्वनि से गीत गाता है। बौद्ध धर्म में वर्षा ऋतु भिक्षुओं को आध्यात्मिक यात्रा, हिंदू धर्म में यह प्रचुरता और नवीनीकरण एवं उर्वरता के लिए आवश्यक अनुष्ठानों तो जैन धर्म में चिंतन और चुनौती के समय के रूप में देखी जाती है। आयुर्वेद इस ऋतु में स्वास्थ्य के लिए आहार समायोजन पर जोर देता है। वर्षा ऋतु कृषि के लिए तो संजीवनी जैसी है, जब धरती में दबे बीज अंकुरित होने को उतावले हो जाते हैं।
वर्षा प्राकृतिक और आध्यात्मिक दोनों तरह के कायाकल्प का प्रतीक है। यह मौसम हमें प्रकृति की लय और पर्यावरण संरक्षण के महत्व की भी याद दिलाता है। जैसे बादलों से गिरती पानी की तेज बौछारें तमाम कचरा अपने साथ बहाकर सारी गंदगी दूर कर देती हैं, वैसे ही मन के भीतर भी ऐसी ही एक ऋतु बदलनी चाहिए। जाने कब से वहां क्रोध, मान, माया, लोभ, कषाय की और कुछ अप्रिय जली हुई यादों की राख इकट्ठा है। वहां भी एक सकारात्मकता की बारिश होनी चाहिए, जो सिर्फ मन को गीला ही न करें, अपितु भीतर जमी हुई हर काई कीचड़ को बहाकर ले जाए। साथ ही बहा ले जाए वे सभी यादें, जो अब स्मृति नहीं बोझ बन गई हैं। वे चेहरे जो अब सिहरन पैदा करते हैं। वे रिश्ते जो बस नाम मात्र के बनकर रह गए हैं और वे दर्द जो अब एक आदत बन गए हैं। इन सबको मन से बाहर कर दे और शीतलता का मरहम लगाकर आतंक, उन्माद, भेदभाव और हिंसा की पीड़ाओं को हर ले, ताकि फिर से सहिष्णुता, सद्भावना के बीजों की नई कोंपले पल्लवित होकर हमारे मन को फिर से सुख-शांति की हरियाली से संपन्न करें।
डा. निर्मल जैन
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