जीवन की अनिश्चितता

जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। हर समय मन में यह शंका बनी रहती है कि घर से निकलते समय हम सुरक्षित वापस लौटेंगे या नहीं। यदि हर क्षण शंका मन में बनी रहेगी, तो यह हमारे कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव डालने लगेगी। इसलिए सब कुछ नियति पर छोड़कर शंका-मुक्त होकर अपने कार्यों में लगे रहना ही उचित है। शंका की तपस मस्तिष्क को उलझाए रखती है। शंका की तपस का अर्थ है हर क्षण संदेह में रहना जो कभी-कभी एक मानसिक व्याधि का कारण बन जाता है। निराधार या पूर्वाग्रहित शंका मन में घर कर जाती है। आजकल दुर्घटनाएं और अपराध आम बात हो गए हैं, जिससे मन में दुविधा और भय होना स्वाभाविक है।

कहा जाता है कि चिंता चिता के समान होती है इसलिए शंका किसी अग्नि-तपस से कम नहीं है। लोगों को सकारात्मक सोच अपना कर शंका दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इससे भय और आशंका भले ही कम न हों, लेकिन परिस्थितियों का सामना करने की ऊर्जा अवश्य प्राप्त होती है। संदेह की स्थिति में भी अपने मार्ग पर चलते रहना, कुछ सीखना और कुछ प्राप्त करना आवश्यक है। ईश्वर पर विश्वास रखकर कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ना चाहिए।

जीवन में सुख-दुख का चक्र चलता रहता है। दुखी होने पर ऐसा लगता है कि हमसे अधिक कष्ट किसी को नहीं है, लेकिन जब चारों ओर देखें, तो हम पाएंगे कि कई लोग हमसे अधिक कृठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। इसीलिए शंका करना व्यर्थ है, क्योंकि यदि सुख चला गया है तो कष्ट भी एक दिन निश्चित रूप से समाप्त होगा। जिस समस्या का समाधान आज नहीं है, वह कल अवश्य आएगा। भविष्य के प्रति आशावादी दृष्टिकोण अपनाना ही बुद्धिमत्ता है। हम मानव हैं त्रुटियां होती हैं, लेकिन उन्हें सुधारने के अवसर भी मिलते हैं। इस तथ्य को जितनी जल्दी स्वीकार करें उतना ही बेहतर होगा।

छाया श्रीवास्तव

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