गतिशील समय
समय गतिशील है। समय एक जैसा कभी नहीं रहता। इसे प्राकृतिक दृष्टि से भी देखा जाए तो समय परिवर्तनशील ही दिखेगा। सुबह के समय का वातावरण कुछ रहता है, दोपहर में कुछ और हो जाता है। जबकि शाम-रात होते अंधेरा छा जाता है। इसी तरह मनुष्य के जीवन में भी समय परिवर्तित होता रहता है। कभी-कभी साधारण-सा दिखने वाले व्यक्ति का समय हो सकता है कि उसकी तूतीं बोलने लगे और चारों तरफ जय-जयकार होने लगे। यहीं से स्थितियां बिगड़ती हैं। ऊंचे ओहदे या स्थिति में पहुंचा व्यक्ति मान लेता है कि जीवन पर्यंत उसका ऐसा ही महत्व बना रहेगा, लेकिन सामान्यतया जीवन में बदलाव आता ही है। तुलसीदास जी ने 'प्रभुता पाई काहि मद नाहीं' में इसका संकेत दे दिया है कि महत्व बढ़ने पर अहंकार आ ही जाता है, परंतु मनुष्य के जीवन का पतन भी अहंकार से होता है।
ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति का समय बुलंदी पर हो तो उसे संयम तथा विनम्र बन जाना चाहिए। इसका फायदा यह होगा कि समय बदला और उसका प्रभाव और महत्व कम हुआ फिर भी लोग उसका सम्मान करते रहेंगे। जबकि बहुत से व्यक्ति समय अच्छा तथा अनुकूल आने पर लोगों से दूरी बना लेते हैं। वे अपने परिचितों एवं शुभचिंतकों तक को हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। ऐसे मनुष्यों के जीवन में जैसे ही गिरावट आती है, वैसे ही लोग भी उन्हें हेय दृष्टि से देखने लगते हैं। बेहतर यही है कि जो भी जहां कहीं महत्वपूर्ण पदों पर हो या अच्छी स्थिति में हो, उसे चाहिए कि अपने से नीचे के लोगों को आगे लाने का प्रयास करे। ऐसी स्थिति में प्रभुता संपन्न व्यक्ति के जीवन में गिरावट आती भी है तो उसके द्वारा किए गए कार्यों की लोग सराहना करेंगे कि जब मौका था तो उस व्यक्ति ने समाज हित में बहुत सारा कार्य किया तथा लोगों को सम्मान भी दिया। अतः समय को एक जैसा कभी नहीं मानना चाहिए।
सलिल पांडेय
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