मानव से सिद्धात्मा
संसार में रहते हुए सांसारिक पदार्थों का मन पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे असंपृक्त रह पाना कठिन है। वैरागी मन पर राग की अनगिनत परतें होती हैं। वासना, आसक्ति, मोह, लोभ, कामना, लालसा, स्पृहा मानव मन के स्वाभविक' रंग हैं। कभी मन में सात्विक भाव का उदय होता है तो हम करुणा, प्रेम, कर्तव्यपालन, परिश्रम और परमार्थ की भावना से भर उठते हैं। वहीं, तम गुण के हावी होने पर क्रोध, भय, विनाशक प्रवृत्ति से भर जाते हैं। हालांकि यह मानवीय प्रकृति है, इस पर ग्लानि नहीं, अपितु नियंत्रण का प्रयास हो।
साधक वही हैं, जो उस साधना में लगा है कि मन को कैसे जीता जाए। जब आंशिक रूप से राग-द्वेष, लोभ-लालसा, उद्वेग-संवेग शेष रहते हैं, तब भी वह साधक ही है। साधक किसी विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी की तरह है जो विद्यार्जन कर रहा है, अनुशासन में ढलने का प्रयास कर रहा है, घंटों बैठकर अध्ययन करने का शरीर को प्रशिक्षण देता है। साधक वही जो काया और माया को साधने का जी-तोड़ प्रयास करे। अतः कुछ समय के लिए भी वीतरागी होने का मन करे तो समझना चाहिए कि साधना का पावन मार्ग खुल चुका है। मन की मूल प्रवृत्ति है वीतराग, वह अपने स्वरूप में लौटना चाहता है। इच्छाओं के वशीभूत माया के कारागार में फंसा मनुष्य जब पूरी तरह से क्रोध, लोभ, मोह, मद आदि से विरत हो जाए, तब वह 'सिद्ध' पुरुष कहलाता है। सिद्ध होने के लिए कुछ वर्ष ही पर्याप्त नहीं। यह भी अनिवार्य है कि सिद्ध पुरुष होने के लिए मानव बनकर ही जन्म लेना पड़ता है। मानव से साधक, साधक से सिद्ध होने की यात्रा इसी काया में संभव है। देवताओं को भी यह सुविधा नहीं है। प्रथमतः अपने भाग्य को सराहें कि मानव रूप में जन्म मिला। प्रेरणा, सत्संग, स्वाध्याय किसी भी माध्यम से आत्म उन्नति की राह दिखे तो उस पर चल देना चाहिए।
ट्विंकल तोमर सिंह
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