मन को समझें

मन जब निराशा से भर जाता है तो मनुष्य आशा और प्रसन्नता के स्रोत खोजता है। कभी वह सफल हो जाता है, तो कभी निराश होता है। कभी ऐसा भी लगता है कि स्थितियां बदलना असंभव हैं। ऐसी भावना जीवन को दुष्कर बना देती है। वास्तव में वह अपने आप को भुला देता है और अपने जीवन से ही सीख नहीं लेता। निराशा में उसे स्मरण नहीं रहता कि जब वह शिशु था तो न बोल सकता था, न बैठ सकता था और न चल सकता था। कितने प्रयास किए तब वह बोलना सीख पाया था। वह बोलना तब सीखा, जब कई प्रयासों के बाद भी न बोल पाने पर निराश नहीं हुआ। वह बार-बार गिरा, तब बैठना, खड़े होना और चलना सीखा। वर्णमाला सीखने के लिए भी उसे बहुत प्रयास करने पड़े। शिशु अवस्था में वह निराशा से ऊपर था, क्योंकि उसकी चिंतन शक्ति सीमित थी। यह अयोग्यता नहीं, योग्यता थी, जिसके कारण वह बोलना, खाना, बैठना, चलना और पढ़ना, लिखना सीख सका।

यदि वह अपने निर्बल हाथों को जो एक चम्मच नहीं पकड़ सकते थे, कठोर श्रम करने योग्य बना सकता है, अपने अशक्त पैरों में खड़े होने की शक्ति उत्पन्न कर सकता है और क, ख, ग से आरंभ कर भाषा पर अधिकार जमा सकता है तो वह किसी भी असंभव को संभव बना सकता है। एक शिशु के रूप में उसने जो सामर्थ्य प्राप्त की है उससे अधिक महान उपलब्धि और कुछ नहीं हो सकती। एक शिशु के रूप में वह सामर्थ्य इसलिए प्राप्त कर सका, क्योंकि वह अपने पोषक़ माता-पिता और शिक्षक पर विश्वास कर उनके अनुकूल चलता रहा।

आज वह वयस्क है तो उसे समझना होगा कि उसके पालक, पोषक वास्तव में परमात्मा हैं। वह शिशु काल में जैसे अपने माता-पिता पर पूर्ण आश्रित था, वैसा भाव वह परमात्मा के प्रति रखे। अपने अंदर के शिशु को सदैव जीवित रखे। अपने अंदर के शिशु को अपनी प्रेरणा बनाए। जीवन सरल और सहज हो जाएगा।

- डा. सत्येंद्र पाल

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