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Showing posts from August, 2025

समीक्षा और निंदा

समीक्षा और निंदा दो भिन्न अवधारणाएं हैं, जो अक्सर समाज में भ्रम उत्पन्न करती हैं। समीक्षा में सुधारात्मक दृष्टिकोण होता है, जबकि निंदा नकारात्मकता का प्रतीक है। जब हम किसी व्यक्ति के कार्यों की समीक्षा सकारात्मक और सुधारात्मक दृष्टि से करते हैं, तो वह व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार करने के लिए प्रेरित होता है। संत-महापुरुष, माता-पिता, गुरुजन और सज्जन लोग हमेशा अपने प्रियजनों के विकास की दृष्टि से उनकी समीक्षा करते हैं। समीक्षा एक दर्पण के समान है, जिसमें व्यक्ति को अपने संपूर्ण आचार-विचार की छवि दिखाई देती है। यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति को अपने गुणों को विकसित करने में मदद करता है। समीक्षा एक सैद्धांतिक आक्षेप है, जो व्यक्ति के चिंतन और क्रिया-कलाप में दोषों का निवारण करता है। इसके विपरीत निंदा व्यक्ति केंद्रित होती है और नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है। यह व्यक्ति को राग-द्वेष से प्रभावित कर हतोत्साहित और अवसादित कर देती है। निंदक हमेशा विवाद और अलगाव को जन्म देते हैं। समीक्षा, सिद्धांत पर आधारित होती है, जबकि निंदा व्यक्ति पर। समीक्षा में सुधार की भावना होती है, जबकि न...

मन को समझें

मन जब निराशा से भर जाता है तो मनुष्य आशा और प्रसन्नता के स्रोत खोजता है। कभी वह सफल हो जाता है, तो कभी निराश होता है। कभी ऐसा भी लगता है कि स्थितियां बदलना असंभव हैं। ऐसी भावना जीवन को दुष्कर बना देती है। वास्तव में वह अपने आप को भुला देता है और अपने जीवन से ही सीख नहीं लेता। निराशा में उसे स्मरण नहीं रहता कि जब वह शिशु था तो न बोल सकता था, न बैठ सकता था और न चल सकता था। कितने प्रयास किए तब वह बोलना सीख पाया था। वह बोलना तब सीखा, जब कई प्रयासों के बाद भी न बोल पाने पर निराश नहीं हुआ। वह बार-बार गिरा, तब बैठना, खड़े होना और चलना सीखा। वर्णमाला सीखने के लिए भी उसे बहुत प्रयास करने पड़े। शिशु अवस्था में वह निराशा से ऊपर था, क्योंकि उसकी चिंतन शक्ति सीमित थी। यह अयोग्यता नहीं, योग्यता थी, जिसके कारण वह बोलना, खाना, बैठना, चलना और पढ़ना, लिखना सीख सका। यदि वह अपने निर्बल हाथों को जो एक चम्मच नहीं पकड़ सकते थे, कठोर श्रम करने योग्य बना सकता है, अपने अशक्त पैरों में खड़े होने की शक्ति उत्पन्न कर सकता है और क, ख, ग से आरंभ कर भाषा पर अधिकार जमा सकता है तो वह किसी भी असंभव को संभव बना सकता है। ...

संकल्प की शक्ति

मनुष्य संकल्प के बल पर बहुत कुछ प्राप्त कर सकता है। संकल्प की शक्ति अनूठी होती है। इस शक्ति के बल पर ऐसे चमत्कार किए जा सकते हैं, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। हम हारने लगते हैं, थकने लगते हैं। बार-बार असफलता हमें निराश करने लगती है। मन उदासी से भर जाता है, उस समय मन का दृढ़ संकल्प हमें नई राह दिखाता है। संकल्प विहीन व्यक्ति जीवन में असफलता को प्राप्त करता है। उसके जीवन का उद्देश्य शून्य होने लगता है। जब तक संकल्प है, तभी तक जीवन में जीवटता है। संकल्प के न होने पर जीवटता भी शिथिल होने लगती है। हम अपने उद्देश्यों तक नहीं पहुंच पाते। संकल्प की शक्ति के सहारे ही भगवान श्रीराम ने नल-नील और वानरों की मदद से अथाह समुद्र पर पुल बांध लिया था। अगर संकल्प दृढ़ न होता तो यह कभी संभव नहीं हो पाता। दशरथ मांझी ने अपने संकल्प के बल पर ही कठोर चट्टान को काटकर मार्ग बना लिया। उसके अनथक प्रयास ने संकल्प के नए चमत्कार को सबके सामने प्रस्तुत किया। अरुणिमा सिन्हा ने एक पैर के सहारे ही एवरेस्ट की चोटी को जीत लिया। यह संकल्प ही है, जिसके सहारे गोताखोर समुद्र की गहराइयों तक पहुंचता है। अंतरिक्ष यात्री अंत...

मानव से सिद्धात्मा

संसार में रहते हुए सांसारिक पदार्थों का मन पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे असंपृक्त रह पाना कठिन है। वैरागी मन पर राग की अनगिनत परतें होती हैं। वासना, आसक्ति, मोह, लोभ, कामना, लालसा, स्पृहा मानव मन के स्वाभविक' रंग हैं। कभी मन में सात्विक भाव का उदय होता है तो हम करुणा, प्रेम, कर्तव्यपालन, परिश्रम और परमार्थ की भावना से भर उठते हैं। वहीं, तम गुण के हावी होने पर क्रोध, भय, विनाशक प्रवृत्ति से भर जाते हैं। हालांकि यह मानवीय प्रकृति है, इस पर ग्लानि नहीं, अपितु नियंत्रण का प्रयास हो। साधक वही हैं, जो उस साधना में लगा है कि मन को कैसे जीता जाए। जब आंशिक रूप से राग-द्वेष, लोभ-लालसा, उद्वेग-संवेग शेष रहते हैं, तब भी वह साधक ही है। साधक किसी विद्यालय में पढ़ने वाले विद्यार्थी की तरह है जो विद्यार्जन कर रहा है, अनुशासन में ढलने का प्रयास कर रहा है, घंटों बैठकर अध्ययन करने का शरीर को प्रशिक्षण देता है। साधक वही जो काया और माया को साधने का जी-तोड़ प्रयास करे। अतः कुछ समय के लिए भी वीतरागी होने का मन करे तो  समझना चाहिए कि साधना का पावन मार्ग खुल चुका है। मन की मूल प्रवृत्ति है वीतराग, वह अप...

गतिशील समय

समय गतिशील है। समय एक जैसा कभी नहीं रहता। इसे प्राकृतिक दृष्टि से भी देखा जाए तो समय परिवर्तनशील ही दिखेगा। सुबह के समय  का वातावरण कुछ रहता है, दोपहर में कुछ और हो जाता है। जबकि शाम-रात होते अंधेरा छा जाता है। इसी तरह मनुष्य के जीवन में भी समय परिवर्तित होता रहता है। कभी-कभी साधारण-सा दिखने वाले व्यक्ति का समय हो सकता है कि उसकी तूतीं बोलने लगे और चारों तरफ जय-जयकार होने लगे। यहीं से स्थितियां बिगड़ती हैं। ऊंचे ओहदे या स्थिति में पहुंचा व्यक्ति मान लेता है कि जीवन पर्यंत उसका ऐसा ही महत्व बना रहेगा, लेकिन सामान्यतया जीवन में बदलाव आता ही है। तुलसीदास जी ने 'प्रभुता पाई काहि मद नाहीं' में इसका संकेत दे दिया है कि महत्व बढ़ने पर अहंकार आ ही जाता है, परंतु मनुष्य के जीवन का पतन भी अहंकार से होता है। ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति का समय बुलंदी पर हो तो उसे संयम तथा विनम्र बन जाना चाहिए। इसका फायदा यह होगा कि समय बदला और उसका प्रभाव और महत्व कम हुआ फिर भी लोग उसका सम्मान करते रहेंगे। जबकि बहुत से व्यक्ति समय अच्छा तथा अनुकूल आने पर लोगों से दूरी बना लेते हैं। वे अपने परिचितों एवं शुभचि...

धैर्य की शक्ति

धैर्य की शक्ति धैर्य में अद्भुत शक्ति है। अनेक संकटों का समाधान निहित है। जिन प्रश्नों का उत्तर विद्वान भी नहीं दे सके उनका हल सदैव धैर्य ने किया है। ऋषि-मुनियों ने धैर्य को भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताया है। सभी उपायों में धैर्य सर्वोत्तम है। संत पथिक जी महाराज का कहना था कि विश्व में जो भी झंझावात हैं, उनका समाधान धैर्य द्वारा सफलता पूर्वक किया जा सकता है। सद्‌गुणों में धैर्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। कठिन से कठिन परीक्षाओं को धैर्य के माध्यम से पार किया जा सकता है। यह एक सिद्ध प्रयोग है। महात्माओं ने धैर्य के चमत्कारी प्रभावों का उल्लेख किया है। ज्ञानार्जन से लेकर जीविकोपार्जन तक, धैर्य की परंपरा अद्भुत और उपयोगी है। यह सबसे सरल साधना के रूप में भी प्रतिष्ठित है। विद्यार्थी, व्यवसायी और राजनेता सभी ने धैर्य से लाभ उठाया है। कभी-कभी धैर्य के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचता। विद्वानों ने समय को धैर्य से जोड़कर विशिष्ट प्रयोजन उद्घाटित किए हैं। लक्ष्य प्राप्ति के लिए समय का सम्मान आवश्यक है। समय का समादर ही धैर्य कहलाता है और काल की उचित प्रतीक्षा भी इसे परिभाषित करती है। इतिहास सा...

जीवन की अनिश्चितता

जीवन अनिश्चितताओं से भरा है। हर समय मन में यह शंका बनी रहती है कि घर से निकलते समय हम सुरक्षित वापस लौटेंगे या नहीं। यदि हर क्षण शंका मन में बनी रहेगी, तो यह हमारे कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव डालने लगेगी। इसलिए सब कुछ नियति पर छोड़कर शंका-मुक्त होकर अपने कार्यों में लगे रहना ही उचित है। शंका की तपस मस्तिष्क को उलझाए रखती है। शंका की तपस का अर्थ है हर क्षण संदेह में रहना जो कभी-कभी एक मानसिक व्याधि का कारण बन जाता है। निराधार या पूर्वाग्रहित शंका मन में घर कर जाती है। आजकल दुर्घटनाएं और अपराध आम बात हो गए हैं, जिससे मन में दुविधा और भय होना स्वाभाविक है। कहा जाता है कि चिंता चिता के समान होती है इसलिए शंका किसी अग्नि-तपस से कम नहीं है। लोगों को सकारात्मक सोच अपना कर शंका दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इससे भय और आशंका भले ही कम न हों, लेकिन परिस्थितियों का सामना करने की ऊर्जा अवश्य प्राप्त होती है। संदेह की स्थिति में भी अपने मार्ग पर चलते रहना, कुछ सीखना और कुछ प्राप्त करना आवश्यक है। ईश्वर पर विश्वास रखकर कर्तव्य-पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। जीवन में सुख-दुख का चक्र चलता रहता है। दुखी होने ...

परनिंदा

परनिंदा की कुप्रवृत्ति से शायद ही कोई अछूता हो। जिस प्रकार परहित के समान कोई धर्म नहीं, परपीड़ा समान कोई निकृष्टता नहीं, उसी प्रकार परनिंदा भी सर्वथा त्याज्य है। रामचरितमानस में भगवान श्रीराम शबरी को नवधा भक्ति की समझ देते हुए कहते हैं, जो मिले वही पर्याप्त है, उसी में संतोष होना चाहिए और स्वप्न में भी दूसरों के दोषों को नहीं देखना चाहिए। यह वर्जना इस बात को स्पष्ट करती है कि जाग्रत अवस्था में परनिंदा से बचना आवश्यक है। अच्छे लोग हमें खुशी देते हैं, श्रेष्ठ लोग स्मरणीय यादें देते हैं, जबकि परनिंदक नकारात्मक बातें सिखाते हैं। किसी संत ने कहा है, " परनिंदा से किसी को कुछ हाथ नहीं लगता। ऐसे लोग महा मूर्ख होते हैं और पाप का पर्वत ढोने का काम करते हैं। ' परनिंदा को एक प्रकार का रस कहा गया है, जिससे परनिंदा प्रेमी विरत नहीं रह पाते, लेकिन यह एक नकारात्मक प्रवृत्ति है, जिसमें लोग कुंठा, प्रतिशोध या ईर्ष्या के कारण संलग्न होते हैं और अपनी कमियों को छिपाते एवं स्वयं को श्रेष्ठ दिखाते हैं। इससे न केवल दूसरों की भावनाओं का निरादर होता है, बल्कि यह आपसी संबंधों को भी क्षति पहुंचा सकता है।...