समीक्षा और निंदा
समीक्षा और निंदा दो भिन्न अवधारणाएं हैं, जो अक्सर समाज में भ्रम उत्पन्न करती हैं। समीक्षा में सुधारात्मक दृष्टिकोण होता है, जबकि निंदा नकारात्मकता का प्रतीक है। जब हम किसी व्यक्ति के कार्यों की समीक्षा सकारात्मक और सुधारात्मक दृष्टि से करते हैं, तो वह व्यक्ति अपने व्यवहार में सुधार करने के लिए प्रेरित होता है। संत-महापुरुष, माता-पिता, गुरुजन और सज्जन लोग हमेशा अपने प्रियजनों के विकास की दृष्टि से उनकी समीक्षा करते हैं। समीक्षा एक दर्पण के समान है, जिसमें व्यक्ति को अपने संपूर्ण आचार-विचार की छवि दिखाई देती है। यह एक सकारात्मक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति को अपने गुणों को विकसित करने में मदद करता है। समीक्षा एक सैद्धांतिक आक्षेप है, जो व्यक्ति के चिंतन और क्रिया-कलाप में दोषों का निवारण करता है। इसके विपरीत निंदा व्यक्ति केंद्रित होती है और नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है। यह व्यक्ति को राग-द्वेष से प्रभावित कर हतोत्साहित और अवसादित कर देती है। निंदक हमेशा विवाद और अलगाव को जन्म देते हैं। समीक्षा, सिद्धांत पर आधारित होती है, जबकि निंदा व्यक्ति पर। समीक्षा में सुधार की भावना होती है, जबकि न...